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    • भारत में महिलाओं के लिए कानूनी सुरक्षा की व्यापक श्रृंखला
    • यौन उत्पीड़न से संरक्षण
    • विवाहित महिलाएँ
    • व्यक्तिगत सुरक्षा उपाय
    • महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा
    • कार्यस्थलों में महिलाओं का संरक्षण

    भारत में महिलाओं के लिए कानूनी सुरक्षा की व्यापक श्रृंखला

    • स्वतंत्रता पूर्व काल में महिलाओं की दुर्दशा के कारण हिन्दू विधवा पुनर्विवाह अधिनियम, 1856, बाल विवाह निरोध अधिनियम, 1929, हिन्दू महिलाओं का संपत्ति का अधिकार अधिनियम, 1937 और मुस्लिम विवाह विघटन अधिनियम, 1939 पारित किया गया। किंतु सामाजिक प्रथाओं के चलते महिलाओं को समस्याएँ अभी भी झेलनी पड़ीं। इसी को देखते हुए संविधान में लेख 51‑A (03‑01‑1977 से लागू) जोड़ा गया, जो हर नागरिक का मूल कर्तव्य बताता है कि वह महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुँचाने वाली कृतियों का परित्याग करे।
    • महिला उत्थान एवं उनके उद्धार के लिए कई कानून बनाए गए, जैसे फैक्ट्री अधिनियम, 1948; अनैतिक मानव व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956; समान वेतन अधिनियम, 1956; हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956; हिन्दू विवाह अधिनियम 1956; मातृत्व भत्ता अधिनियम 1961; दहेज निषेध अधिनियम 1961; मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकार संरक्षण) अधिनियम 1986; महिलाओं की अपमानजनक प्रस्तुति (निषेध) अधिनियम 1986; तथा सती प्रथा (निवारण) अधिनियम 1987 आदि।
    • फिर भी भेदभाव जारी रहा और 1990 में राष्ट्रीय महिला आयोग अधिनियम लाया गया ताकि महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन हो, इन मामलों की जांच की जा सके और केंद्र एवं राज्य सरकारों को उपयुक्त सिफारिशें दी जा सकें।
    • पूर्व‑जांच तकनीक (नियमन और दुरुपयोग निवारण) अधिनियम, 1994 ऐसी ही एक व्यवस्था है, जो लड़कियों के लिंग से भेदभाव को रोकने का प्रयास करता है।

    पिछले सात दशकों में लगातार प्रयासों के बावजूद, हमें सही मायने में समानता हासिल नहीं हुई है। * (यह अधिनियम बाद में 1983 में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के कारण निरस्त कर दिया गया था)

    इसके पीछे कारण स्पष्ट है—कानूनी निरक्षरता और सामाजिक प्रथाएँ, जो आर्थिक‑सामाजिक ढांचे से जुड़ी हैं। उदाहरणार्थ, गरीब परिवारों की लड़कियाँ संपत्ति‑विरासत के कानून की जगह पारिवारिक उत्पीड़न को लेकर चिंतित होती हैं। यह मानसिक भेदभाव उनके पूरे जीवन में उनके साथ चलता रहता है। इसी कारण 1994 का पीएनडीटी अधिनियम लाया गया था ताकि गर्भ में भ्रूण का लिंग विवरण ना किया जाए। यह यथार्थ दर्शाता है कि शिक्षा‑प्राप्त वर्ग भी महिला‑भेदभाव से मुक्त नहीं है।

    इतिहास में अन्य काले पक्ष भी रहे जैसे बाल-विवाह और सती प्रथा। स्वामी विवेकानंद, परमहंस और राजा राममोहन राय जैसे धर्मगुरुओं ने आवाज़ उठाई, पर सामाजिक कुप्तियाँ बरकरार थीं। वैश्वीकरण के युग में समान अधिकार ही भारत को वैश्विक पहचान दिला सकते हैं।

    नीचे कुछ महत्वपूर्ण कानूनों के बारे में बताया गया है जो भारतीय महिलाओं के जीवन को प्रभावित करते हैं:

    • पीएनडीटी अधिनियम की धारा 6 के अनुसार गर्भ में भ्रूण का लिंग बताने के लिए किसी अस्पताल या प्रयोगशाला को टेस्ट करने की अनुमति नहीं है। उल्लंघन पर 22 की धारा के तहत तीन वर्ष तक कैद और जुर्माना हो सकता है। डाक्टर भी राज्य चिकित्सा परिषद द्वारा प्रतिबंधित किया जा सकता है।
    • मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेगनेंसी अधिनियम, 1971: पंजीकृत चिकित्सक के बिना गर्भपात, गर्भवती महिला या उसके अभिभावक की सहमति के बिना 12 से 20 सप्ताह तक गर्भपात कानूनन निषिद्ध है, केवल महिला के जीवन या स्वास्थ्य की रक्षा हेतु ही अनुमति मिल सकती है।
    • कानून के अनुसार लड़की का विवाह 18 वर्ष से पहले नहीं होना चाहिए—जो इसका उल्लंघन करता है, उसे सजा भुगतनी होगी।
    • 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की से विवाह करने पर तीन महीने तक की जेल और जुर्माना हो सकता है।

    यौन उत्पीड़न से सुरक्षा

    1. यहाँ यह उल्लेख करना उचित होगा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 312 के अंतर्गत किसी भी व्यक्ति द्वारा जानबूझकर किसी महिला का गर्भपात कराना अपराध है, जिसके लिए सात वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माने का प्रावधान है। यदि ऐसा गर्भपात महिला की सहमति के बिना किया जाता है, तो उक्त अपराध के लिए दस वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना हो सकता है।
    2. इसके अतिरिक्त, यदि कोई व्यक्ति बिना सद्भावना के, गर्भवती महिला की सहमति के बिना गर्भपात कराने का प्रयास करता है और उसके परिणामस्वरूप महिला की मृत्यु हो जाती है, तो ऐसे व्यक्ति को आजीवन कारावास की सजा दी जा सकती है।
    3. इसके अलावा, किसी भी व्यक्ति द्वारा किसी बच्चे को जीवित जन्म लेने से रोकने के उद्देश्य से किया गया कोई भी कार्य दस वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडनीय है।
    4. बारह वर्ष से कम आयु के बच्चे के पिता या माता, जिनकी अभिरक्षा में वह बच्चा है, उसे त्यागने या परित्याग करने के उद्देश्य से छोड़ नहीं सकते। यदि कोई व्यक्ति ऐसा करता है, तो उसे सात वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
    5. यह भी उल्लेखनीय है कि यदि कोई व्यक्ति किसी बच्चे के मृत शरीर को (चाहे उसकी मृत्यु जन्म से पहले, जन्म के समय या जन्म के बाद हुई हो) जन्म को छिपाने के उद्देश्य से गुप्त रूप से दफनाता है या अन्य किसी प्रकार से उसका निपटान करता है, तो उसे दो वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
    6. किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की लज्जा भंग करने के उद्देश्य से उस पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना दो वर्ष तक के कारावास अथवा जुर्माने या दोनों से दंडनीय अपराध है।
    7. यदि कोई व्यक्ति 18 वर्ष से कम आयु की नाबालिग लड़की को किसी स्थान से अवैध यौन संबंध स्थापित करने के उद्देश्य से बहला-फुसलाकर ले जाता है, तो वह दस वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने का भागी होगा।
    8. किसी नाबालिग लड़की को विदेश से भारत लाकर उसे अवैध यौन संबंध के लिए विवश करने या प्रलोभित करने पर भी दस वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना हो सकता है।
    9. 18 वर्ष से कम आयु की लड़की को वेश्यावृत्ति के उद्देश्य से खरीदना या बेचना दस वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडनीय है।
    10. किसी पुरुष द्वारा किसी महिला की इच्छा के विरुद्ध या उसकी सहमति के बिना (जब महिला की आयु 16 वर्ष से अधिक हो), अथवा मृत्यु या चोट का भय दिखाकर, अथवा यह विश्वास दिलाकर कि वह उससे विधिवत विवाहित है, या जब महिला सहमति देते समय मानसिक रूप से अस्वस्थ हो अथवा नशीले पदार्थ/मादक द्रव्य के प्रभाव में हो—ऐसी स्थिति में किया गया यौन संबंध भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के अंतर्गत बलात्कार माना जाता है, जिसके लिए न्यूनतम सात वर्ष का कारावास, जो आजीवन कारावास तक बढ़ सकता है, का प्रावधान है।
      • यह भी स्पष्ट किया जाता है कि ऐसी परिस्थितियों में 16 वर्ष से कम आयु की लड़की की सहमति मान्य सहमति नहीं मानी जाएगी।
      • यह भी विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि न्यायालय की अनुमति के बिना बलात्कार पीड़िता की पहचान को प्रकाशित या प्रचारित करना दो वर्ष तक के कारावास अथवा जुर्माने से दंडनीय अपराध है।
      • यदि कोई पुरुष अपनी पत्नी के साथ, जो न्यायालय के आदेश से पृथक रह रही हो, यौन संबंध स्थापित करता है, तो ऐसे पति को दो वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जा सकता है।
      • यह भी उल्लेखनीय है कि किसी लोक सेवक द्वारा अपनी अभिरक्षा में रखी गई महिला के साथ, या किसी जेल अधीक्षक द्वारा जेल में निरुद्ध महिला के साथ, अथवा किसी अस्पताल के प्रबंधन से जुड़े व्यक्ति द्वारा अस्पताल में भर्ती किसी महिला के साथ यौन संबंध स्थापित करने का प्रयास करने पर पाँच वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना लगाया जा सकता है।
    11. प्राकृतिक व्यवस्था के विरुद्ध किसी पुरुष द्वारा किसी महिला के साथ यौन संबंध स्थापित करना दस वर्ष तक के कारावास या आजीवन कारावास एवं जुर्माने से दंडनीय है।
    12. यदि कोई पुरुष किसी महिला के साथ इस विश्वास में सहवास करता है कि वह उसकी विधिवत पत्नी है, जबकि वास्तव में ऐसा नहीं है, तो उसे दस वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने की सजा हो सकती है।
    13. यदि कोई पति, जिसकी पत्नी जीवित है, दूसरा विवाह करता है, तो उसे सात वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। यदि ऐसा दूसरा विवाह पहली शादी को छिपाकर किया गया हो, तो सजा दस वर्ष तक के कारावास तक बढ़ सकती है।
    14. किसी पुरुष द्वारा विवाह की रस्में निभाना, जबकि वह जानता है कि वह विधिक रूप से विवाह करने का पात्र नहीं है, सात वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है।
    15. किसी अन्य पुरुष की पत्नी के साथ, उसके पति की सहमति या मिलीभगत के बिना यौन संबंध स्थापित करना व्यभिचार माना जाता है, जिसके लिए पाँच वर्ष तक का कारावास एवं जुर्माना हो सकता है।
    16. यदि कोई व्यक्ति किसी विवाहित महिला को उसके पति या अभिभावक की अभिरक्षा से बहला-फुसलाकर ले जाता है, ताकि वह किसी अन्य व्यक्ति के साथ अवैध यौन संबंध स्थापित करे, या उसे छिपाता या बहकाता है, तो ऐसे व्यक्ति को तीन वर्ष तक के कारावास से दंडित किया जा सकता है।
    17. अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 की धारा 4 के अनुसार, किसी महिला को वेश्यावृत्ति में संलग्न करना या इस उद्देश्य से मकान किराए पर देना तीन वर्ष तक के कारावास से दंडनीय है। इसके अतिरिक्त, 18 वर्ष से अधिक आयु का कोई भी व्यक्ति जो किसी वेश्या की आय पर जीवनयापन करता है, उसे दो वर्ष तक के कारावास की सजा दी जा सकती है।

    विवाहित महिलाएँ

    रोज़गार से संबंधित सामान्य कानूनों तथा महिलाओं के शारीरिक कल्याण से जुड़े प्रावधानों के अंतर्गत वयस्क/विवाहित महिलाओं के अधिकारों का यहाँ विशेष रूप से उल्लेख किया जा रहा है। इस संदर्भ में यह ध्यान देने योग्य है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 के अनुसार ‘किसी भी नागरिक’ के साथ लिंग के आधार पर, अथवा राज्य के अधीन किसी निर्वाचित पद पर नियुक्ति या रोज़गार से संबंधित मामलों में, भेदभाव करना निषिद्ध है।
    विवाहित महिलाओं के शारीरिक कल्याण के विषय में यह उल्लेखनीय है कि यदि पति या उसके संबंधियों द्वारा किसी महिला के साथ क्रूरता की जाती है, तो ऐसे व्यक्तियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए के अंतर्गत तीन वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडित किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, यदि विवाह के सात वर्षों के भीतर किसी विवाहित महिला की मृत्यु सामान्य परिस्थितियों के अतिरिक्त होती है और यह सिद्ध हो जाता है कि उसकी मृत्यु से ठीक पूर्व उसे पति या उसके किसी संबंधी द्वारा दहेज की मांग के संबंध में क्रूरता या उत्पीड़न का सामना करना पड़ा था, तो ऐसी मृत्यु को ‘दहेज मृत्यु’ माना जाएगा।
    यदि किसी महिला को आत्महत्या के लिए उकसाया जाता है, तो ऐसे उकसाने वाले व्यक्ति को कारावास की सजा दी जा सकती है, जिसकी अवधि दस वर्ष तक बढ़ाई जा सकती है, इसके अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

    महिलाओं की वित्तीय सुरक्षा

    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 47(2) के अनुसार, किसी ऐसी जगह या आवास की तलाशी, जो किसी महिला के कब्जे में हो और जो स्वयं गिरफ्तारी के लिए वांछित व्यक्ति न हो, किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा तब तक नहीं ली जा सकती जब तक कि उस महिला को यह सूचना न दे दी जाए कि वह उस स्थान से बाहर जाने के लिए स्वतंत्र है।
    • दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 100(3) के अनुसार, यदि किसी महिला के पास किसी ऐसी वस्तु को छिपाए जाने का उचित संदेह हो, जिसकी तलाशी ली जानी है, तो ऐसी तलाशी केवल किसी अन्य महिला द्वारा और शालीनता का पूर्ण ध्यान रखते हुए ही की जाएगी।
    • किसी भी मामले की जांच के संबंध में, पंद्रह वर्ष से कम आयु के किसी पुरुष व्यक्ति या किसी महिला को किसी भी पुलिस अधिकारी द्वारा पुलिस थाना नहीं बुलाया जा सकता।
      1. पंजाब पुलिस नियमावली, 1934 (जो पुलिस अधिनियम, 1861 के अंतर्गत बनाई गई है) के खंड 3 के पैरा 26.18-ए में यह प्रावधान किया गया है कि महिलाओं की सभी गिरफ्तारियाँ—चाहे वारंट सहित हों या बिना वारंट के, तथा जमानती या गैर-जमानती अपराधों में—केवल सहायक उप-निरीक्षक (Assistant Sub-Inspector) से कम पद के नहीं होने वाले पुलिस अधिकारी द्वारा ही की जाएँगी। यदि ऐसा अधिकारी उपलब्ध न हो, तो ऐसी गिरफ्तारी महिला के जिम्मेदार पुरुष संबंधियों तथा गाँव/नगर के जिम्मेदार अधिकारियों की उपस्थिति में किसी हेड कांस्टेबल द्वारा की जा सकती है।
      2. किसी महिला की गिरफ्तारी की सूचना गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी द्वारा पुलिस अधीक्षक को भी दी जानी आवश्यक है, तथा यदि गिरफ्तारी सहायक उप-निरीक्षक से निम्न पद के अधिकारी द्वारा की गई हो, तो उसके कारण भी स्पष्ट रूप से अंकित किए जाने चाहिए।
      3. उक्त नियम के अनुसार, किसी महिला को पुलिस हिरासत में, अपरिहार्य परिस्थितियों को छोड़कर, एक रात के लिए भी पुलिस थाने में नहीं रखा जाएगा तथा किसी महिला को पुलिस हिरासत में भेजने के लिए आवेदन का समर्थन करने वाला राजपत्रित पुलिस अधिकारी ऐसी बंदी की सम्मानजनक अभिरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक उपाय करने का उत्तरदायी होगा।
      4. उक्त नियम यह भी निर्धारित करता है कि पुलिस जांच या पूछताछ में सम्मिलित होने वाली महिलाएँ (जो गिरफ्तारी में नहीं हैं) को आवश्यक समय से अधिक नहीं रोका जाएगा तथा उनसे सूर्यास्त से सूर्यास्त के बीच पुलिस थाने में उपस्थित होने की अपेक्षा नहीं की जाएगी।
    • यदि किसी महिला को गिरफ्तार किया जाता है, तो गिरफ्तारी करने वाले अधिकारी का यह अनिवार्य कर्तव्य है कि वह गिरफ्तारी के कारणों, गिरफ्तारी के पश्चात व्यक्ति को कहाँ निरुद्ध रखा जाएगा तथा उसे कब न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा—इन सभी तथ्यों का उल्लेख करते हुए एक गिरफ्तारी ज्ञापन (मेमो) तैयार करे। माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा डी. के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य, 1997 (1) SCC 416 में दिए गए निर्देशों के अनुसार, ऐसे गिरफ्तारी ज्ञापन की प्रति गिरफ्तार व्यक्ति के परिवार के सदस्य, संबंधी या पड़ोसी को भी प्रदान की जानी आवश्यक है।
    • गिरफ्तार प्रत्येक महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 की धारा 12 के अंतर्गत निःशुल्क विधिक सहायता प्राप्त करने का अधिकार है तथा जिस न्यायालय के समक्ष ऐसी गिरफ्तार महिला को प्रस्तुत किया जाता है, उस न्यायालय का यह कर्तव्य है कि वह उसे निःशुल्क विधिक सहायता के उसके अधिकार के बारे में अवगत कराए, जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खत्री एवं अन्य बनाम बिहार राज्य (AIR 1981 SC 928) तथा इसके पश्चात सुखदास बनाम अरुणाचल प्रदेश संघ शासित प्रदेश (AIR 1986 SC 991) में प्रतिपादित किया गया है।
    • यदि किसी महिला को विचारण के उपरांत हत्या जैसे जघन्य अपराधों के लिए मृत्युदंड दिया जाता है, तो दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 416 के अनुसार उसकी मृत्यु-दंड की सजा को स्थगित किया जाना आवश्यक है तथा उसे आजीवन कारावास में परिवर्तित भी किया जा सकता है।

    महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा

    • महिलाओं की आर्थिक सुरक्षा के संदर्भ में यह उल्लेखनीय है कि यदि कोई गैर-मुस्लिम व्यक्ति, जिसके पास पर्याप्त साधन हों, अपनी पत्नी (जिसमें वह तलाकशुदा पत्नी भी सम्मिलित है जिसने पुनर्विवाह नहीं किया हो) का भरण-पोषण करने से इंकार करता है या उपेक्षा करता है, तो न्यायालय ऐसे व्यक्ति को उसकी पत्नी के भरण-पोषण हेतु मासिक भत्ता देने का आदेश दे सकता है। यह भत्ता पक्षकारों की आर्थिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए मजिस्ट्रेट द्वारा निर्धारित किया जाएगा।
    • पति एवं पत्नी के मध्य तलाक याचिका लंबित रहने की स्थिति में, यदि दोनों में से किसी के पास अपने निर्वाह के लिए पर्याप्त स्वतंत्र आय न हो, तो न्यायालय पति या पत्नी के आवेदन पर याचिका के प्रतिवादी को याचिका व्यय के अतिरिक्त ऐसी अन्य राशि का भुगतान करने का आदेश दे सकता है, जिसे न्यायालय याचिकाकर्ता की स्वयं की आय तथा प्रतिवादी की आय को ध्यान में रखते हुए मासिक भरण-पोषण के रूप में उचित समझे।
    • हिंदू विवाह अधिनियम, 1956 की धारा 25 के अंतर्गत न्यायालय को विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करते समय अथवा उसके पश्चात, पति या पत्नी में से किसी के आवेदन पर, स्थायी गुजारा भत्ता प्रदान करने का अधिकार प्राप्त है।
    • मुस्लिम पत्नी के भरण-पोषण से संबंधित कानून को मुस्लिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अंतर्गत पृथक रूप से विन्यस्त किया गया है, जिसके अनुसार तलाकशुदा मुस्लिम महिला को ‘इद्दत’ अवधि के दौरान युक्तिसंगत एवं न्यायोचित भरण-पोषण एवं प्रावधान प्राप्त करने का अधिकार है। ‘इद्दत’ अवधि का तात्पर्य तलाक की तिथि के पश्चात तीन मासिक धर्म चक्रों की अवधि (यदि वह मासिक धर्म से गुजरती हो) अथवा तीन चंद्र महीनों की अवधि (यदि वह मासिक धर्म से नहीं गुजरती हो) से है; अथवा तलाक की तिथि और बच्चे के जन्म या गर्भसमापन के बीच की अवधि (यदि तलाक की तिथि पर वह गर्भवती थी)।

    यदि उक्त अवधि के दौरान पूर्व पति द्वारा ऐसा कोई भरण-पोषण प्रदान नहीं किया जाता है, तो तलाकशुदा महिला मजिस्ट्रेट के समक्ष आवेदन कर सकती है। यदि मजिस्ट्रेट इस बात से संतुष्ट हो जाता है कि पति के पास पर्याप्त साधन होने के बावजूद उसने महिला के भरण-पोषण हेतु उचित प्रावधान करने में विफलता या उपेक्षा की है, तो मजिस्ट्रेट ऐसे पति को तलाकशुदा महिला की आवश्यकताओं, विवाह के दौरान उसके द्वारा भोगे गए जीवन-स्तर तथा उसके पूर्व पति की आर्थिक क्षमता को ध्यान में रखते हुए, महिला को उचित एवं न्यायोचित भरण-पोषण एवं प्रावधान का भुगतान करने का निर्देश दे सकता है।

    टिप्पणी:— इस अधिनियम की धारा 3 के अंतर्गत, दो वर्ष की आयु तक बच्चे के भरण-पोषण का अधिकार उस स्थिति में तलाकशुदा महिला के अधिकार का ही एक अंग माना जाता है, जब वह स्वयं बच्चे का पालन-पोषण कर रही हो। अतः मुस्लिम दंपति के बच्चे का दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के अंतर्गत भरण-पोषण का अधिकार इस अधिनियम द्वारा किसी प्रकार से सीमित नहीं किया गया है, जैसा कि माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा मस्त. नूरसुबा बनाम मोहम्मद कासिम, AIR 1997 SC 3280 में निर्णय दिया गया है।

    • जहाँ कोई तलाकशुदा मुस्लिम महिला (जिसने पुनर्विवाह नहीं किया हो) ‘इद्दत’ की अवधि के पश्चात स्वयं का भरण-पोषण करने में असमर्थ हो और उसके वयस्क बच्चे हों, वहाँ मजिस्ट्रेट ऐसे बच्चों को उसका भरण-पोषण करने का आदेश देगा। यदि ऐसे बच्चे भरण-पोषण करने में असमर्थ हों, तो मजिस्ट्रेट उस तलाकशुदा महिला के माता-पिता को उसका भरण-पोषण करने का आदेश देगा। यदि उसके माता-पिता भी भरण-पोषण करने में असमर्थ हों, तो मजिस्ट्रेट मुस्लिम विधि के अनुसार, उसकी मृत्यु के पश्चात उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी होने वाले उसके संबंधियों को, जिस अनुपात में वे उसकी संपत्ति के उत्तराधिकारी होते, उसी अनुपात में भरण-पोषण का भुगतान करने का आदेश देने के लिए सक्षम होगा।
    1. यदि ऐसे किसी संबंधी के पास अपने हिस्से का भरण-पोषण देने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध न हों, तो मजिस्ट्रेट अन्य ऐसे संबंधियों को, जिनके पास पर्याप्त साधन हों, उन संबंधियों के हिस्से का भरण-पोषण भी करने का आदेश देगा। किंतु जहाँ किसी तलाकशुदा महिला का कोई संबंधी न हो अथवा ऐसे संबंधियों के पास भरण-पोषण करने के लिए पर्याप्त साधन उपलब्ध न हों, वहाँ मजिस्ट्रेट ऐसे संबंधियों के हिस्से के भरण-पोषण का भुगतान राज्य वक्फ बोर्ड द्वारा किए जाने का आदेश देगा, जो उस तलाकशुदा मुस्लिम महिला का भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं।
    2. टिप्पणी:— तथापि, इस अधिनियम की धारा 5 के प्रावधानों के अनुसार, किसी मुस्लिम दंपति के लिए यह विकल्प खुला है कि वह आवेदन की सुनवाई कर रहे न्यायालय के समक्ष संयुक्त रूप से या पृथक रूप से शपथ-पत्र अथवा किसी अन्य लिखित घोषणा के माध्यम से यह व्यक्त करे कि वह दंड प्रक्रिया संहिता की धाराओं 125 से 128 के प्रावधानों द्वारा शासित होना चाहता/चाहती है।
    • हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956, जो जाति के आधार पर हिंदू, बौद्ध, जैन अथवा सिख सभी व्यक्तियों पर लागू होता है, यह प्रावधान करता है कि किसी पुरुष हिंदू की स्वयं अर्जित संपत्ति, यदि उसकी मृत्यु बिना वसीयत किए (अवसीयत) हो जाती है, तो उसकी विधवा, जीवित पुत्रों, पुत्रियों तथा माता पर समान भागों में उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त होगी। इसके अतिरिक्त, किसी महिला के हिस्से में एक बार आई हुई संपत्ति उसकी पूर्ण स्वामित्व वाली संपत्ति बन जाती है और उसे उससे वंचित नहीं किया जा सकता, भले ही वह विधवा उस संपत्ति के प्राप्त होने के पश्चात पुनर्विवाह कर ले। तथापि, कोई भी उत्तराधिकारी जो किसी अवसीयत मृतक से पूर्व-मृत पुत्र की विधवा, पूर्व-मृत पुत्र के पूर्व-मृत पुत्र की विधवा अथवा भाई की विधवा के रूप में संबंधित हो, वह उस अवसीयत मृतक की संपत्ति का उत्तराधिकार प्राप्त करने की अधिकारी नहीं होगी, यदि उत्तराधिकार खुलने की तिथि को उसने पुनर्विवाह कर लिया हो। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 ने महिलाओं की संपत्ति को धारण करने, अर्जित करने तथा उसका निपटान करने की स्थिति को अत्यधिक सुदृढ़ किया है।

    कार्यस्थलों पर महिलाओं का संरक्षण

      • कारखाना अधिनियम, 1948 की धारा 19 के अनुसार महिलाओं के लिए पृथक शौचालय एवं मूत्रालयों का निर्माण किया जाना अनिवार्य है।
      • उक्त अधिनियम की धारा 22 के अंतर्गत यह प्रावधान किया गया है कि किसी महिला से चलती हुई मुख्य मशीन या किसी संचरण मशीनरी के किसी भी भाग की सफाई, चिकनाई या समायोजन का कार्य नहीं कराया जाएगा।
      • उक्त अधिनियम की धारा 27 के अनुसार किसी ऐसे कारखाने के किसी भी भाग में, जहाँ कपास खोलने की मशीन कार्यरत हो, महिलाओं को कपास दबाने के कार्य में नियोजित नहीं किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, धारा 48 यह प्रावधान करती है कि प्रत्येक ऐसे कारखाने में, जहाँ 30 से अधिक महिला श्रमिक कार्यरत हों, उन महिलाओं के 6 वर्ष से कम आयु के बच्चों के उपयोग हेतु एक उपयुक्त कक्ष की व्यवस्था एवं उसका रख-रखाव किया जाएगा।
      • समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 की धाराएँ 4 और 5 समान प्रकृति के कार्य करने वाले पुरुष एवं महिला श्रमिकों को समान पारिश्रमिक प्रदान करने का प्रावधान करती हैं तथा पुरुषों और महिलाओं की भर्ती से संबंधित मामलों में भेदभाव को निषिद्ध करती हैं। यदि ऐसा भेदभाव किया जाता है, तो यह न्यूनतम तीन माह से लेकर एक वर्ष तक के कारावास एवं जुर्माने से दंडनीय है।
      • आगे यह भी उल्लेखनीय है कि मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 की धारा 4 के अनुसार कोई भी महिला प्रसव या गर्भपात की तिथि के तुरंत बाद के छह सप्ताह की अवधि के दौरान किसी भी प्रतिष्ठान में कार्य नहीं करेगी। इसके अतिरिक्त, गर्भावस्था की अवधि के दौरान महिला से ऐसा कोई कठिन कार्य, जिसमें लंबे समय तक खड़े रहना पड़े, या कोई ऐसा कार्य नहीं कराया जाएगा जो उसकी गर्भावस्था में बाधा उत्पन्न कर सकता हो।
      • उक्त अधिनियम की धारा 5 के अंतर्गत यह भी प्रावधान है कि गर्भवती महिला को कुल 12 सप्ताह का पूर्ण वेतन सहित अवकाश प्राप्त होगा, जिसमें प्रसव की तिथि से पूर्व छह सप्ताह एवं प्रसव के पश्चात छह सप्ताह सम्मिलित हैं। इसके अतिरिक्त, यदि महिला ने एक वर्ष की अवधि में कम से कम 80 दिन कार्य किया हो, तो गर्भपात की स्थिति में भी वह पूर्ण वेतन सहित अवकाश की हकदार होगी।
      • माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रिट याचिका (फौजदारी) संख्या 666-70/1992 एवं आपराधिक विविध याचिका संख्या 7021-31/1992 में पारित निर्णय (विशाखा एवं अन्य बनाम राजस्थान राज्य एवं अन्य) के आलोक में, हरियाणा सरकार द्वारा “शिकायत समिति” के गठन का प्रावधान किया गया है, जिसकी अध्यक्षता एक महिला द्वारा की जाएगी तथा जिसके कम से कम आधे सदस्य महिलाएँ होंगी। यह शिकायत समिति यौन उत्पीड़न से संबंधित शिकायतों की जाँच यथाशीघ्र एवं गोपनीय रूप से करने हेतु अपनी स्वयं की कार्यविधि अपनाएगी। साथ ही, जब शिकायत समिति इस बात से संतुष्ट हो जाए कि यौन उत्पीड़न किया गया है, तो संबंधित अधिकारी के विरुद्ध सक्षम प्राधिकारी द्वारा किसी प्रारंभिक जाँच की आवश्यकता नहीं होगी। उक्त निर्देशों में “यौन उत्पीड़न” की परिभाषा निम्नानुसार दी गई है:–
        1. शारीरिक संपर्क एवं अनुचित अग्रसरता;
        2. यौन अनुग्रह की मांग या अनुरोध;
        3. यौन आशय से किए गए अभद्र टिप्पणियाँ;
        4. अश्लील सामग्री का प्रदर्शन;
        5. यौन प्रकृति का कोई भी अन्य अवांछित शारीरिक, मौखिक अथवा अमौखिक आचरण।

    उपरोक्त विवेचना से यह स्पष्ट होता है कि सरकारों द्वारा समय-समय पर महिलाओं की स्थिति में सुधार हेतु अपने स्तर पर प्रयास किए गए हैं, किंतु केवल कानून ही अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। जब तक वे महिलाएँ, जिनके हित में ये कानून बनाए गए हैं, अवसर आने पर अपने अधिकारों के प्रति सजग होकर उन्हें दृढ़ता से लागू नहीं करेंगी, तब तक इन कानूनों का पूर्ण लाभ प्राप्त नहीं हो सकेगा—विशेषकर उन परिस्थितियों में, जहाँ उनके अधिकारों की उपेक्षा की जाती है, उन्हें दबाया जाता है या उनका उल्लंघन किया जाता है।