बंद करना

    परिचय

    प्रकाशित तिथि : 2 सितम्बर, 2026

    संवैधानिक प्रावधान

    भारत के संविधान की प्रस्तावना सभी नागरिकों को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय प्रदान करने का संकल्प व्यक्त करती है। संविधान का अनुच्छेद 39-क यह सुनिश्चित करता है कि आर्थिक अथवा अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी व्यक्ति को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न किया जाए।

    इस संवैधानिक दृष्टिकोण तथा अनुच्छेद 39-क में निहित निदेश के अनुरूप, संसद द्वारा विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 अधिनियमित किया गया, जिसके माध्यम से समाज के कमजोर वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएँ तथा समान एवं न्यायसंगत विवाद समाधान उपलब्ध कराने के लिए देशव्यापी संस्थागत व्यवस्था स्थापित की गई।

    विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987

    विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987, जो 9 नवम्बर, 1995 से प्रभावी हुआ, भारत में समान न्याय तक पहुँच सुनिश्चित करने की प्रतिबद्धता का आधार है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 39-क को व्यावहारिक रूप प्रदान करने के उद्देश्य से अधिनियमित इस अधिनियम के अंतर्गत राज्य का यह दायित्व निर्धारित किया गया है कि समाज के वंचित, आर्थिक रूप से कमजोर तथा असहाय वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएँ उपलब्ध कराई जाएँ।

    इस अधिनियम का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आर्थिक अथवा अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय प्राप्त करने के अवसर से वंचित न होना पड़े।

    विधिक सेवा प्राधिकरणों की संरचना

    देशभर में विधिक सेवाओं के अधिदेश को प्रभावी ढंग से लागू करने के लिए विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत विभिन्न स्तरों पर एक सुदृढ़ संस्थागत व्यवस्था स्थापित की गई है, जिसमें शीर्ष स्तर पर राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA) तथा इसके साथ राज्य, जिला और तालुका स्तर के विधिक सेवा प्राधिकरण/समितियाँ शामिल हैं।

    विधिक सहायता प्रदान करने के अतिरिक्त, इस अधिनियम की एक महत्वपूर्ण विशेषता लोक अदालतों की वैधानिक व्यवस्था है। लोक अदालतें वैकल्पिक विवाद समाधान का एक प्रभावी माध्यम हैं, जिनके माध्यम से लंबित न्यायालयीन मामलों तथा न्यायालय में मामला दायर करने से पूर्व के विवादों का शीघ्र, सुलभ एवं सौहार्दपूर्ण समाधान किया जाता है।

    लोक अदालत द्वारा पारित प्रत्येक अवार्ड को विधि के अनुसार सिविल न्यायालय की डिक्री माना जाता है तथा वह अंतिम और पक्षकारों पर बाध्यकारी होता है।

    विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अंतर्गत विभिन्न स्तरों पर निम्नलिखित विधिक सेवा संस्थाओं की व्यवस्था की गई है:

    • राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA)
    • राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (SLSA)
    • उच्च न्यायालय विधिक सेवा समितियाँ
    • जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA)
    • तालुका विधिक सेवा समितियाँ

    राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़

    विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के अनुरूप, चंडीगढ़ संघ राज्य क्षेत्र के प्रशासक द्वारा पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, चंडीगढ़ के माननीय मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से चंडीगढ़ विधिक सेवा प्राधिकरण नियम, 1997 बनाए गए, जिसके अंतर्गत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण, केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़ की औपचारिक स्थापना 19 जनवरी, 1998 को हुई।

    प्राधिकरण का मूल दायित्व पात्र व्यक्तियों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सेवाएँ उपलब्ध कराना है, ताकि आर्थिक अथवा अन्य अक्षमताओं के कारण कोई भी नागरिक न्याय तक पहुँच के अवसर से वंचित न हो।

    केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़ में अपने कल्याणकारी एवं विधिक सहायता कार्यक्रमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए प्राधिकरण राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), चंडीगढ़ तथा विभिन्न प्रशासनिक विभागों एवं अन्य संबंधित हितधारकों के साथ समन्वय स्थापित करके कार्य करता है।

    प्राधिकरण का नेतृत्व न्यायपालिका के वरिष्ठ सदस्यों द्वारा किया जाता है। पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश प्राधिकरण के पैट्रन-इन-चीफ होते हैं, जबकि उच्च न्यायालय के एक वरिष्ठ न्यायाधीश कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में प्राधिकरण के कार्यों का मार्गदर्शन करते हैं।

    वर्तमान में प्राधिकरण माननीय श्री न्यायमूर्ति अश्वनी कुमार मिश्रा, मुख्य न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, के पैट्रन-इन-चीफ तथा माननीय श्री न्यायमूर्ति अनूप चितकारा, न्यायाधीश, पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय, के कार्यकारी अध्यक्ष के मार्गदर्शन में कार्यरत है। प्रशासनिक एवं कार्यकारी कार्यों का संचालन श्री अरुण कुमार अग्रवाल, अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, द्वारा सदस्य सचिव के रूप में किया जा रहा है।

    जिला विधिक सेवा प्राधिकरण

    जमीनी स्तर पर जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA), केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़, न्याय को सभी के लिए सुलभ बनाने के महत्वपूर्ण उद्देश्य को आगे बढ़ाता है। प्राधिकरण का नेतृत्व चंडीगढ़ के विद्वान जिला एवं सत्र न्यायाधीश द्वारा अध्यक्ष के रूप में किया जाता है तथा न्यायपालिका से नियुक्त पूर्णकालिक सचिव द्वारा इसके कार्यों में सहयोग प्रदान किया जाता है। वर्तमान में श्री सुनील कुमार, मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, जिला विधिक सेवा प्राधिकरण, यू.टी. चंडीगढ़ के सचिव के रूप में इसके कार्यकारी कार्यों का संचालन कर रहे हैं।

    जिला विधिक सेवा प्राधिकरण का प्रमुख दायित्व समाज के कमजोर एवं वंचित वर्गों को निःशुल्क एवं सक्षम विधिक सहायता प्रदान करके समान अवसर एवं न्याय के संवैधानिक वादे को वास्तविक रूप प्रदान करना है।

    कानून और आम नागरिक के बीच की दूरी को कम करने के लिए प्राधिकरण द्वारा केंद्र शासित प्रदेश, चंडीगढ़ के विभिन्न क्षेत्रों में नियमित रूप से निःशुल्क विधिक सहायता शिविर, विधिक साक्षरता अभियान तथा जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन सक्रिय पहलों के माध्यम से जिला विधिक सेवा प्राधिकरण यह सुनिश्चित करता है कि प्रत्येक नागरिक के लिए विधिक संरक्षण एवं सहायता स्थानीय स्तर पर सुलभ, शीघ्र और प्रभावी रूप से उपलब्ध हो।